E20 पेट्रोल: क्या तरक्की के नाम पर अवाम पर नया बोझ डाला जा रहा है?

E20 पेट्रोल नीति से पानी के संकट और गाड़ियों के माइलेज पर बुरा असर पड़ सकता है. तरक्की के नाम पर बिना ठोस विकल्प दिए जनता की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालना कतई मुनासिब नहीं है.

इस्लाम इंसान को जमीन का मालिक नहीं, बल्कि उसका अमीन (अमानतदार) मानता है. कुरआन इंसाफ करने, फिजूलखर्ची से बचने और जमीन में फसाद न फैलाने की तालीम देता है. इसलिए अगर कोई सरकारी पॉलिसी पानी, खेती, पर्यावरण और आम आदमी की जिंदगी पर दूरगामी असर डालती हो, तो उस पर सवाल उठाना सिर्फ जम्हूरी हक ही नहीं बल्कि एक अखलाकी जिम्मेदारी भी है.

इसी नजरिए से E20 पेट्रोल पर गंभीर गौर करने की जरूरत है. E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल. हुकूमत का कहना है कि इससे कच्चे तेल का आयात घटेगा, किसानों की आमदनी बढ़ेगी और प्रदूषण कम होगा. मकसद अच्छे हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या उन्हें हासिल करने का यही सबसे बेहतर रास्ता है?

सबसे पहला सवाल पानी का है. भारत पहले ही पानी के गंभीर संकट से जूझ रहा है. एथेनॉल का बड़ा हिस्सा गन्ने और मक्का जैसी फसलों से तैयार होता है. खास तौर पर गन्ना ऐसी फसल है जिसे बहुत ज्यादा पानी चाहिए. जब कई राज्यों में भूजल लगातार नीचे जा रहा हो, तब ईंधन बनाने के लिए पानी की इतनी बड़ी खपत क्या वाकई मुनासिब है?

एक तरफ अवाम से कहा जाता है कि हर बूंद बचाइए, दूसरी तरफ उसी पानी से गाड़ियों के लिए ईंधन तैयार किया जा रहा है. यह सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि नीतिगत तजाद (विरोधाभास) भी है.

दूसरा बड़ा मसला आम आदमी की जेब से जुड़ा है. एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है. यही वजह है कि ऑटोमोबाइल विशेषज्ञ मानते हैं कि E20 इस्तेमाल करने पर माइलेज में कुछ कमी आ सकती है. यानी जितनी दूरी पहले कम पेट्रोल में तय होती थी, अब उसके लिए थोड़ा ज्यादा ईंधन लगेगा. अगर दाम लगभग वही रहें और माइलेज घट जाए, तो आखिरकार बोझ किस पर पड़ेगा? जाहिर है, आम उपभोक्ता पर.

इससे भी बड़ा सवाल देश की करोड़ों पुरानी गाड़ियों का है. भारत की सड़कों पर बड़ी तादाद में ऐसे दोपहिया और चारपहिया वाहन चल रहे हैं जो E20 के हिसाब से डिजाइन नहीं किए गए थे. कई वाहन निर्माता कंपनियां भी पुराने मॉडलों के लिए सावधानी बरतने की सलाह देती रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक एथेनॉल से रबर सील, फ्यूल लाइन और कुछ प्लास्टिक पुर्जों पर असर पड़ सकता है. अगर आगे चलकर E20 ही प्रमुख ईंधन बन जाए, तो पुराने वाहन मालिकों के सामने मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

तीसरा अहम सवाल “फूड बनाम फ्यूल” का है. जब गन्ना, मक्का और दूसरी कृषि उपज का बड़ा हिस्सा ईंधन बनाने में इस्तेमाल होगा, तो यह बहस लाजिमी है कि पहले इंसान की थाली भरी जाए या गाड़ियों का टैंक. भारत जैसा मुल्क, जहां आज भी करोड़ों लोग सस्ती खाद्य व्यवस्था पर निर्भर हैं, वहां यह सवाल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

चौथा पहलू पर्यावरण का है. हुकूमत का दावा है कि E20 से कार्बन उत्सर्जन कम होगा. इसमें कुछ हद तक सच्चाई है, लेकिन पूरी तस्वीर इससे कहीं बड़ी है. सिर्फ गाड़ी के साइलेंसर से निकलने वाले धुएं को देखकर फैसला नहीं किया जा सकता. गन्ना उगाने, सिंचाई करने, खाद डालने, फसल ढोने और एथेनॉल बनाने में भी भारी मात्रा में पानी, बिजली और ऊर्जा खर्च होती है. इसलिए कई वैज्ञानिक पूरे जीवन-चक्र यानी “वेल-टू-व्हील” आधार पर मूल्यांकन करने की बात करते हैं. असली पर्यावरणीय फायदा तभी समझ में आएगा जब पूरी प्रक्रिया का हिसाब लिया जाए. नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक भी E20 का कुल GHG फायदा सिर्फ 18% है 50% नहीं.

पांचवां सवाल विकल्प का है. जर्मनी जैसे मुल्कों ने एथेनॉल मिश्रित ईंधन अपनाया, लेकिन उपभोक्ता से उसका चुनाव करने का हक नहीं छीना. वहां नई और पुरानी गाड़ियों के हिसाब से अलग-अलग विकल्प उपलब्ध हैं. इससे न उपभोक्ता पर जबरदस्ती होती है और न ही पुरानी गाड़ियों के मालिक अपने आपको बेबस महसूस करते हैं. भारत में भी अगर संक्रमण काल में E20 के साथ कम मिश्रण वाले ईंधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहें, तो लोगों की कई परेशानियां दूर हो सकती हैं.

दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आज सिर्फ एथेनॉल पर भरोसा नहीं कर रहीं. वे इलेक्ट्रिक वाहन, हरित हाइड्रोजन, सार्वजनिक परिवहन, बैटरी तकनीक और दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन पर भी तेजी से काम कर रही हैं. इसका मतलब यह नहीं कि एथेनॉल बेकार है, बल्कि यह कि किसी एक तकनीक को अंतिम हल मान लेना दूरअंदेशी नहीं कहलाएगा.

इस्लाम भी यही सिखाता है कि फैसले मसलहत, इंसाफ और अवाम की आसानी को सामने रखकर किए जाएं. कुरआन फरमाता है कि अल्लाह फिजूलखर्ची करने वालों को पसंद नहीं करता और जमीन में बिगाड़ फैलाने से रोकता है. अगर किसी पॉलिसी से पानी पर दबाव बढ़े, खेती प्रभावित हो और आम आदमी पर अतिरिक्त बोझ पड़े, तो उसका जायजा लेना जरूरी हो जाता है.

इसके अलावा, E20 पर बहस को सियासी ऐनक से नहीं, बल्कि इल्म, साइंस, मआशियात (अर्थशास्त्र) और अवाम के मुफाद की बुनियाद पर देखा जाना चाहिए.

अगर हुकूमत इस पॉलिसी को वास्तव में कामयाब बनाना चाहती है, तो तीन कदम जरूरी हैं. पहला, पुरानी गाड़ियों के लिए पर्याप्त विकल्प और संक्रमण व्यवस्था सुनिश्चित की जाए. दूसरा, एथेनॉल उत्पादन में गन्ने और खाद्यान्न पर अत्यधिक निर्भरता कम कर कृषि अपशिष्ट और दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन को बढ़ावा दिया जाए. तीसरा, इस पूरी पॉलिसी का स्वतंत्र वैज्ञानिक और आर्थिक मूल्यांकन समय-समय पर सार्वजनिक किया जाए ताकि अवाम का एतमाद (विश्वास) मजबूत हो.

E20 का विरोध तरक्की का विरोध नहीं है. असली सवाल यह है कि तरक्की ऐसी हो जो पानी भी बचाए, खेती भी बचाए, पर्यावरण भी महफूज रखे और आम आदमी की जेब पर भी बेवजह बोझ न डाले. कामयाब हुकूमत वही होती है जो सिर्फ नई योजनाएं नहीं बनाती, बल्कि हर पॉलिसी को इंसाफ, दूरअंदेशी और अवाम के मुफाद की कसौटी पर भी परखती है. यही टिकाऊ तरक्की है, यही बेहतर हुकूमतदारी है और यही वह रास्ता है जिसकी तालीम हमें दीन, संविधान और साइंस- तीनों देते हैं.

Source : https://zeenews.india.com/hindi/auto-news/the-hidden-costs-of-e20-fuel-mileage-drop-engine-compatibility-and-water-crisis/3259063

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